Wednesday, 19 May 2010

अभाव...

आज मेरे पास 
बहुत ही कम शब्द
बहुत ही कम मायने है 

जो कह ना पाया 
और जो कह ना सका 
उसी पुलिंदे में 
कैद सब अफ़साने है 

आज मेरे पास 
बहुत ही कम शब्द
बहुत ही कम मायने है 

खोल देता वो बंधन 
इसी आस में 
रेह गए हम 
जिंदगी की तलाश में 

आज मेरे पास 
बहुत ही कम शब्द
बहुत ही कम मायने है 

कभी दूर से देखे थे 
रौशनी के दीये
अब तो आँखों में 
बस अँधेरे चुंधियाते है

आज मेरे पास 
बहुत ही कम शब्द
बहुत ही कम मायने है 

Thursday, 18 March 2010

दर्द

दर्द ही मेरा अपना है
उसे बाटने को मत कहो
उसे हिस्सों में किया
तो मैं भी बट जाऊंगा

Saturday, 13 March 2010

पतझड़

सूखे पीले पत्ते
शाख से लटक रहे थे
उनका कोई वजूद न था
और ना ही उन्हें
किसी की तलाश थी

वो उन यादो की तरह थे
जिन्हें ना ही कभी
ठुकरा जा सकता है
और ना ही कभी
अपनाया जा सकता है

अलग होना ही
उनकी नियति है
पुराने पड़ चुके
अधूरे ख्वाबो की तरह
उन्हें भी टूटना ही था

अब दोनों को
इंतज़ार उस पतझड़ का है
बहा कर
ले जाए जो
सब अपने आवेग में

Monday, 22 February 2010

दो ढीठ ...

ना जिंदगी हमे बदल सकी
और ना हम जिंदगी को

ढीठ है वो
और ढीठ है हम

उसने ना कभी हमारी सुनी
और ना हमने कभी उसकी

दो राहे
अनजान डगर

एक उसने चुनी
और एक हमने

Wednesday, 9 December 2009

मकाम

जो रौशनी की शै
बुझा दी थी
कभी की, खुद ही

आज भी
उसकी आस
दिल में रहती है

अँधेरी राह
तनहा सफ़र
खुद ही चुना है

मगर जाने क्यों
उस उजाले की तलाश
दिल में रहती है

खुद की तलाश में
जितना दूर जाता हू खुद से
उतना ही तुम्हे पास पाता हू

जान के भी सब
एक अनजान खलिश हमेशा
दिल में रहती है

रास्ता कट जाएगा अकेले भी
मगर जीने की आस
दिल में रहती है

Wednesday, 28 October 2009

साकार - निराकार

शब्द जाल में
जब
मायने पिरोने
को ना बचे
मन तब
खामोशी ओढ़ लेता है
नितांत
निर्विरोध
बस
अपने में सिमट कर
करता है इंतज़ार
सुबह की पौ फटने का

Tuesday, 15 September 2009

व्याकुल

मन की खामोशी को
निचोर्ड कर
कुछ शब्दों में
भर लेता हू

भाव भी कुछ
निकल ही आते है
आशय भी
मिल जाते है

पर
बाद में बचे
कोरे मन
का क्या करू मै

जो इस सब के बाद भी
उतना ही
व्याकुल
और अशांत है

Friday, 4 September 2009

सफ़र ...

कच्चे
अधपके
कुछ ख्वाब
है बस

खामोशी
और शोर के बीच
जिंदगी को
पार लगाते

Monday, 31 August 2009

मोड़...

जिंदगी फिर
उसी मोड़
पे मूड़ गयी

ले आई मुझे
फिर उसी
रहगुज़र

जहा से
चला था मै कभी
भूलने को सफ़र

Monday, 24 August 2009

मन का शोर...

जो लफ्जों में कैद था कभी
आज उसे मै आजाद करता हू

चुप रहता हू आज मै
और मन का शोर सुनता हू

अपने को बांध रखा था जिन सीमओं में
आज उस कैद से अपने को आजाद करता हू

चुप रहता हू आज मै
और मन का शोर सुनता हू

समय ने जकडा था जिस बंदिश में आज उससे बाहर आता हू

चुप रहता हू आज मै
और मन का शोर सुनता हू

उम्मीद से मायूसी तक लम्बा रास्ता था जो
आज उसे मै आराम देना कहता हू

चुप रहता हू आज मै
और मन का शोर सुनता हू

Friday, 14 August 2009

क्या होता है

क्या होता है
जब जो चाहा
वो नहीं होता

लोगो से सुना था
दुनिया रुक जाती है
पलट जाता है सब कुछ

झूठ है सब

साँसे अब भी
ज्यो की त्यों है
नब्ज़ भी चल रही है

कुछ भी तो नहीं बदला

बदला है तो सिर्फ नजरिया
और मुस्कुराहट में
अब शामिल है दर्द की एक टीस

Monday, 10 August 2009

गुजारिश

कल शाम मैंने
सूरज को लहरों में पिघलते देखा
धीरे धीरे
अपना सारा दर्द धुल रहा था

कल शाम मैंने
आसमान को समंदर में सिमटे देखा
नीले से स्याह होता
सब कुछ अपने अन्दर समाये जा रहा था

कल शाम मैंने
तारो को टिमटिमाते
चाँद को सांस लेता देखा
अपनी अलग ही दुनिया में मदमस्त

कल शाम मैंने
इन सबको मुझसे कहता देखा
कोई तो रंग चुनो
हस लो, रो लो, या जी लो