Tuesday, 8 May 2007

खुद से बाते ...

ख्वाब आते है रोज़ एक दस्तक देते है
धीरे से कुछ उम्मीदो का वास्ता देते
और फिर चुप-चाप से मायूस हो कर लौट जाते है

कभी मन बेचैन हो उठता है
अपने आप से, और कभी हर उस शै से लड़ता है
जिस्से मुझे सहरा मिलता है

लगता है जैसे
मैं खुद से लड़ रहा हूँ
और शायद थक भी चुका हूँ

चलते रेहने की नसीहत देना
और हसते रेहना
इतना मुशकिल भी नही जीना

फिर क्यूँ मैं हर ख्वाब को झूठलाता हूँ
कदमो के निशान मिटाता हूँ
और अपने मे सिमट जाता हूँ

7 comments:

Shrish said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है। नियमित लेखन हेतु मेरी तरफ से शुभकामनाएं।

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ई-पंडित

alpana verma said...

koshish achchee hai Manik....likhteY raheeyeY :)

Ashutosh said...

श्रीश ,

बहुत बहुत धन्यवाद । आप का स्वागत पृष्ट हिन्दी नव - चिट्ठाकारो के लिए जानकारी तथा तथ्यों से भरा है ।

- आशुतोष

Ashutosh said...

अल्पना जी ,

प्रोत्साहन का धन्यवाद :)

- आशुतोष

Anonymous said...

You know chaos in the world brings uneasiness, but it also allows the opportunity for creativity and growth and I feel that this chaos somehow helped you to penn down your thoughts...really touching and relative. aparna

Poonam said...

Speechless.!!
aapke shabd bahut sundar hain.

Ashutosh said...

धन्यवाद पूनम