Saturday 2 March 2013

शुक्र है

शुक्र है 
उन लोगो का 
उन बातो का 
जो ज़ख्म कुरेदते रहते है 

ज़िन्दगी के एहसास को 
और मुझको 
जिंदा रखते है 

Post Script: बीती रात जैसे ही इन पंक्तियों को उकेरा, चित्रा सिंह की गायी ग़ज़ल - "किसी रंजिश को हवा दो" (http://www.youtube.com/watch?v=GWzAx-JNYZw) याद आ गयी। फिर से उस ग़ज़ल को सुना और कुछ नये मायने समझे और  महसूस किये ।

2 comments:

Udan Tashtari said...

लोग दर्द की बात करते हैं...और मैने मुस्कराने के लिए एक जख़्म कुरेदा है अभी!!


-बहुत खूब!! अच्छा लगा कि फिर कुछ लिखा तो...अब नियमित मौका निकालें- थोड़ा सा ही सही!!

शुभकामनायें...

Ashutosh said...

धन्यवाद समीर भाई , पूरा प्रयास रहेगा महसूस और अभिव्यक्त करने का ।

- आशुतोष