Sunday, 8 April 2007

विवेचना

कविता तथा लेखन मन के उन भावो को व्यक्त करने का माध्यम है जिन्हे हम प्रायः परोक्ष रुप से व्यक्त नही कर पाते है । हमारे अन्दर चल रहे द्वन्द को कभी स्वयं समझना एक चुनौती सरीखे है ।

शाम का समय मेरे मॅन को हमेशा ही विचलित कर जाता है । कई बार मैंने इसका कारण समझने का प्रयास किया है और पूरी तरह असफल रह हूँ । मेरे अन्दर का अकेलापन और मौन स्पष्ट रुप से प्रकट होता है । और इस सब के बीच मै निःशब्द और निर्भाव......

7 comments:

Mayank said...

Bhai ek bahut accha prayas hai ye jo hume apni matrabhasha ke kareeb laane mein madadgaar saabit hoga.....lage raho ashu bhai

satyanveshi said...
This comment has been removed by the author.
satyanveshi said...

paroksh nahi yaar


mere khyaal se pratyaksh hona chahiye




BTW, nice effort yaar



hindi mei jaldi kuchh achchha dekhne ko nahi milta hai






keep it up

Ashutosh said...

मयंक भाई ,

ये प्रयास कही ना कही खुद से जुड़ने के ओर ज्यादा उन्मुख है । और आप से निवेदन है कि समान चेष्ठा करे, आपका भी कौशल कुछ कम नही है ।

-आशुतोष

Ashutosh said...

सत्यांवेशी बंधु ,

कई बार हम अपने को व्यक्त करने के लिए शब्दो कि आड़ लेते है । वाग्जाल में बहुत से अनाम भावो की वेदना है । इसी संघर्ष को समझने में प्रयासरत हू ।

ऐसे ही प्रोत्साहित करते रहिए ।

-आशुतोष

Jyoti said...

good words....impressed!!

Ashutosh said...

ज्योति ,

धन्यवाद :) । आशा है भाविषा में भी हम आप की सराहना के पात्र बने रहेगे ।

- आशुतोष